आयकर विभाग, केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (सीबीडीटी) द्वारा संचालित है और भारत सरकार के वित्त मंत्रालय के अधीन राजस्व विभाग का हिस्सा है। प्रयोक्ता विभाग, अपने संगठनात्मक व्यवस्था, कार्यों, कर कानून और नियमों, अंतरराष्ट्रीय कराधान, आदि से संबंधित जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। पैन, टैन, टीडीएस, फॉर्म 16, कर सूचना नेटवर्क, तैयार कर वापसी योजना (टीआरपीएस), आयकर संपर्क केन्द्र (एएसके), करदाताओं आदि के बारे में जानकारी दी गई है। प्रयोक्ता दाखिल आयकर रिटर्न, करों का भुगतान, टैक्स क्रेडिट व्यू, कर रिटर्न की स्थिति, आदि के रूप में ऑनलाइन सेवाओं का उपयोग कर सकते हैं।
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निजी कराधान
व्यक्तियों पर आयकर लगेगा। आय कर व्यवसाय सत्ताओं के अन्य रूपों पर अथवा व्यक्तियों, निगमों द्वारा उपार्जित आय कर वसूल किया गया प्रत्यक्ष कर होता है। भारतीय संविधान ने आय कर की वसूली करने व उसे एकत्रित करने के लिए केवल केंद्र सरकार को ही शक्ति प्रदत्त की है। सरकार द्वारा गठित आयकर विभाग को केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (सीबीडीटी) द्वारा शासित किया जाता है। सीबीडीटी वित्त मंत्रालय में राजस्व विभाग का एक भाग है। इसे भारत में विभिन्न प्रत्यक्ष कर से संबंधित सभी मामलों का प्रभार दिया गया है। यह भारत में प्रत्यक्ष करों की नियोजना व नीति के लिए अनिवार्य इनपुट प्रदान करता है और यह आयकर विभाग के माध्यम से प्रत्यक्ष कर कानून के प्रशासन हेतु भी जिम्मेदार है। आयकर में संबंधित सभी मामलों के लिए, आयकर अधिनियम 1961 अम्ब्रेला अधिनियम है जो केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड को अधिनियम के प्रावधानों को कार्यान्वित करने के लिए नियम (आय कर नियमावली 1962) बनाने की शक्ति प्रदत्त करता है।
आयकर अधिनियम में यह प्रावधान है कि प्रत्येक व्यक्ति की पूर्व वर्ष की कुल आय के संबंध में, आयकर उस निर्धारण वर्ष के लिए वित्त अधिनियम द्वारा निर्धारित दरों पर तदनुरूपी निर्धारण वर्ष के लिए वसूल (चार्ज) किया जाएगा। अन्य शब्दों में, एक वर्ष में उपार्जित आय अगले वर्ष में कर योग्य होती है और निर्धारण वर्ष के लिए निर्धारित आयकर दरें पूर्व वर्ष के दौरान उपार्जित आय के संबंध में लागू होती है।
नोट कीजिए कि :- जिस वित्तीय वर्ष में आय उपार्जित की जाती है, उसे पूर्व वर्ष कहा जाता है। पूर्व वर्ष के बाद आने वाले वित्तीय वर्ष को निर्धारण वर्ष के रूप में जाना जाता है। निर्धारण वर्ष वह वर्ष होता है, जिसमें पूर्व वर्ष में उपार्जित वेतन कर योग्य होता है। कोई भी वित्तीय वर्ष प्रत्येक वर्ष की 1 अप्रैल से आरंभ होता है और उत्तरवर्ती वर्ष की 31 मार्च को समाप्त होता है।
नए शुरू किए गए कार्य व्यापार अथवा व्यवसाय की स्थिति में, व्यक्ति के वर्तमान निर्धारित होने तक, पूर्व वर्ष नया कार्य – व्यापार अथवा व्यवसाय शुरू होने की तारीख से अगली 31 मार्च तक शुरू होता है।
आय कर अधिनियम के अनुसार प्रत्येक वर्ष केंद्र बजट में वार्षिक संशोधन किए जाते है। वजट में वित्त बिल में विभिन्न संशोधन किए जाते हैं, जिनका केंद्र सरकार द्वरा वसूल किए गए प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष कर में पता लगाया जाता है। बिल में आय कर व अन्य करों भी दरों का भी उल्लेख किया जाता है। एक बार अनुमोदित किया गया बिल वित्त अधिनियम बन जाता है और उसमें दिए गए प्रावधानों को आयकर अधिनियम में शामिल किया जाता है।
भारत में सुविकसित कर – संरचना मौजूद है। कर व शुल्क वसूल करने की शक्ति को भारत के संविधान के प्रावधानों के अनुसार तीन स्तरीय सरकार के बीच वितरित किया गया है। संघ सरकार को जिन मुख्य कर/शुल्क, वसूलने की शक्ति प्रदत्त की गई है, वे इस प्रकार हैं :- आय कर (कृषि आय पर कर के अलावा, जिन्हें राज्य सरकार वसूल कर सकती है) सीमा शुल्क, केंद्रीय उत्पाद शुल्क व बिक्री कर और सेवा कर/राज्य सरकारों द्वारा वसूल किए गए मुख्य कर इस प्रकार है: बिक्री कर (अन्तरा – राज्य के माल की बिक्री पर कर), स्टैंप शुल्क (संपत्ति अंतरण पर कर) राज्य उत्पाद शुल्क (एल्कोहल के विनिर्माण पर शुल्क) भूमि राजस्व (कृषि/गैर-कृषि उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल की गई भूमि पर वसूली) व्यावसायिक व कॉलिंग (मांग) पर मनोरंजन कर और शुल्क/स्थानीय निकायों का संपत्ति कर (भवन आदि) चुंगी (स्थानीय निकायों के क्षेत्र के भीतर प्रयोग/खपत हेतु माल प्रविष्टि पर कर) जलापूर्ति, निकास जल आदि जैसी जनोपयोगी सेवाओं के लिए विपणन व कर/प्रयोक्ता प्रभारों से संबंधित कर वसूल करने की शक्ति प्रदत्त की गई है।
आर्थिक सुधारों के परिणामस्वरूप, उदारवादी नीति की दिशा में, भारत में कर प्रणाली में मूलभूत परिवर्तन हुए हैं। कुछ परिवर्तनों में शामिल है :- कर – संरचना का पुनर्गठन करना, सीमा शुल्क की अधिकतम दरों में प्रणामी कटौती, कम की गई निगमित कर की दर, एएसईएएन (एशियन) स्तरों से संबद्ध सीमा शुल्क, शुरू किया गया मूल्य संवर्धित कर, कर – आधार में वृद्धि करना, बेहतर अनुपालन को सुनिश्चित करने के लिए कर-कानून को सरलीकृत किया गया है। भारत में कर नीति में विभिन्न प्रकार के निवेशों के लिए कटौती के रूप में कर – अवकाश का प्रावधान किया गया है। इसमें विभिन्न क्षेत्रों/हिस्सों में स्थित उद्योगों को तथा प्राथमिक क्षेत्रों की प्रोत्साहन देना शामिल है। मूल संरचना के विकास में जुड़े हुए क्षेत्रों के लिए भी कर – प्रोत्साहन उपलब्ध है।
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