02/09/2026
क्या एक बार पूजा कराने के बाद पंडित जी आपके ‘लाइफटाइम फ्री कंसल्टेंट’ हो जाते हैं?
आज डिजिटल युग है। WhatsApp पर कुंडली भेजिए, फोन पर मुहूर्त पूछिए और मिनटों में जवाब चाहिए।
लेकिन एक बात हम भूल गए हैं—डिजिटल सुविधा ने ब्राह्मण की विद्या को मुफ्त सेवा समझने की मानसिकता पैदा कर दी है।
"बाबा, बिटिया की शादी का लग्न अभी देख दीजिए… बहुत जरूरी है।"
पंडित जी अपना काम छोड़कर पंचांग खोलते हैं, गणना करते हैं, कई मुहूर्त देखते हैं।
फिर जवाब आता है—
"बाबा, ये नहीं… कोई दूसरा दिन देखिए। अगले महीने का देखिए।"
घंटों की मेहनत के बाद जब दक्षिणा की बात आती है—
"अरे बाबा, PhonePe नहीं चलाते… बाद में दे देंगे।" 😐
और वह ‘बाद में’ कभी नहीं आता!
कभी एक बार पूजा करा ली, फिर परिवार की कुंडली, भाई की कुंडली, बहन की कुंडली, रिश्तेदारों की कुंडली—सब कुछ मुफ्त में चाहिए।
जब आचार्य दक्षिणा की बात करें तो जवाब—
"अरे पंडित जी! इतनी दक्षिणा तो दे ही चुके हैं। बगल वाले बाबा ₹100 में सब देख देते हैं!"
तो फिर सवाल है—क्या एक बार पूजा कराने की दक्षिणा में पंडित जी की पूरी जिंदगी की विद्या खरीद ली?
डॉक्टर से सलाह लेते हैं तो फीस देते हैं।
वकील से सलाह लेते हैं तो फीस देते हैं।
तो फिर धर्म, ज्योतिष और शास्त्र की विद्या को मुफ्त क्यों समझते हैं?
याद रखिए—
ब्राह्मण की विद्या केवल ज्ञान नहीं, वर्षों की साधना और तपस्या है। उसका समय भी मूल्यवान है।
दक्षिणा केवल पैसा नहीं है; यह विद्या, समय और सेवा के प्रति सम्मान है।
और यदि आपको किसी आचार्य पर विश्वास नहीं है, तो 10 जगह मुहूर्त पूछने के बजाय एक योग्य आचार्य पर विश्वास करना सीखिए।
🙏 ब्राह्मण को मुफ्त सेवा देने वाला नहीं, सम्मान के योग्य आचार्य समझिए।
तभी ब्राह्मण–यजमान का यह पवित्र रिश्ता अपनी गरिमा बनाए रखेगा।
✍️ कमलेंद्र मिश्र (वैदिक)
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